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बंदी व्यक्ति को हिंदी में जानकारी नहीं देने पर, हाई कोर्ट ने हिरासत का आदेश रद्द किया

Published On September 03, 2022 01:36 AM IST
Published By : Mega Daily News

दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी में कथित रूप से शामिल एक व्यक्ति के खिलाफ जारी हिरासत में लेने के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि अधिकारी यह बताने में विफल रहे कि हिरासत के आधार के बारे में बंदी को उसकी भाषा ‘हिंदी’ में जानकारी दी गई. हिरासत को चुनौती देने वाले व्यक्ति के वकील ने कहा कि उन्हें (बंदी को) हिरासत के आधार के बारे में अंग्रेजी भाषा में बताया गया, जिसे वह ठीक से नहीं समझ सके.

हाई कोर्ट ने क्या कहा? 

उच्च न्यायालय ने कहा कि केवल इसलिए कि बंदी ने दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर अंग्रेजी में किए हैं, यह नहीं दिखाता है कि वह अंग्रेजी समझता है और परिणामस्वरूप हिरासत में लिए जाने के आधार को समझता है और दस्तावेजों पर भरोसा करता है.

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने हिरासत में लेने के केंद्र के आदेश को निरस्त कर दिया. यह आदेश भारत सरकार के संयुक्त सचिव द्वारा एक अप्रैल, 2021 को दिया गया गया था, जबकि उप सचिव ने 16 जून, 2021 को यह आदेश पारित किया था, जिसमें एक वर्ष की हिरासत की पुष्टि की गई थी.

पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में प्रतिवादी (भारत संघ) यह बताने में बुरी तरह विफल है कि हिरासत के आधार और दस्तावेजों पर भरोसे को लेकर बंदी के साथ उसकी ज्ञात भाषा हिंदी में ' संवाद' किया गया. पीठ ने कहा, तदनुसार, एक अप्रैल, 2021 का आदेश, संविधान के अनुच्छेद 22 (5) में निहित संवैधानिक निर्देशों का उल्लंघन है, जैसा कि विभिन्न निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्याख्या की गई हैं.

केंद्र के मुताबिक आदतन अपराधी और कथित रूप से मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल शराफत शेख ने हिरासत आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि उसे स्वापक औषधि और मन: प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) और अवैध यातायात की रोकथाम अधिनियम (पीआईटीएनडीपीएस) के तहत हिरासत में लेने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह एनडीपीएस अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत एक मामले में पहले से हिरासत में है.

उसके वकील ने कहा कि बंदी एक अनपढ़ व्यक्ति है और हिरासत में लेने का आदेश उसे ठीक से संप्रेषित नहीं किया गया था, क्योंकि यह अंग्रेजी भाषा में था. वकील ने कहा कि यह राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह हिरासत में लेने के आदेश की जानकारी बंदी को उस भाषा में दे, जिसे वह समझता है.

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